पुस्तक: हम कोई रास्ता न बन पाए
समीक्षा: प्रशांत गुप्ता
निकष सर की किताब ‘हम कोई रास्ता न बन पाए’, की हर एक कविता पढ़कर आपको ऐसा लगेगा कि यह तो मेरे स्वयं के साथ घटित किसी घटना को जोड़ रही है…। आप यह भी सोचेंगे कि यह तो मैं भी सोच रहा था…। यानी की अपना सा अनुभव। कवि और आप में-हम में यही एक फर्क है, हम सोचते हैं लेकिन लिखते नहीं। कवि सोचता है, और सोच को शब्दों की माला बनाकर कागज पर उतार देता है। निकष सर ने मुझे और अमिताभ जी को इस किताब की बुनियाद से जोड़ा। इसकी प्रूफ रीडिंग, कवर पेज फाइनल होने और इसके विमोचन तक, सर ने हमसे हर चीज साझा की। यही वजह है कि मेरा इससे अलग सा लगाव है। आप भी इसे पढ़ें, तो आपको भी ये कविताएं अपनी सी लगेगीं। अंत में एक और खास बात कि निकष सर की कविताओं ने मुझे भी लिखने के लिए प्रेरित किया है…। thank you…
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प्रशांत गुप्ता पत्रकार हैं। अपनी खोजपरक पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। वे कविताएं और गजलें भी लिखते हैं।
