किताब: हम कोई रास्ता न बन पाए
समीक्षा: अमिताभ अरुण दुबे
दुख में हम कभी आसमान की तरफ देखते हैं
और हमारा दुख थोड़ा सा कम हो जाता है
ऐसा क्या देखते हैं हम आसमान में
कि हमारा दुख कम हो जाता है?
- निकष परमार
हम कोई रास्ता न बन पाए। आदरणीय निकष परमार सर का कविता संग्रह आए करीब दो माह बीत चुके हैं। हर दिन सोचता था। इस बेहद खूबसूरत से कविता संग्रह के बारे में कुछ लिखूं। पर अपने को रोक लेता। सिर्फ इसलिए क्योंकि इतने अच्छे काव्य संग्रह पर लिखने के लिएखुद की हैसियत को कम ही आंकता हूं। फिर सर ने आग्रह किया। कुछ लिखना चाहिए। सर की खासियत है कि वो बेहद कम शब्दों मंे गहरी बात लिख जाते हैं। ऐसा करने वाले आज के लेखकों की पीढ़ी में बहुत कम ही लोग हैं। हमने अक्सर सुना है। ज़िंदगी में सहज और सरल होना सबसे कठिन है। मैं ये मानता हूं कि लेखन में सहज और सरल होना उससे भी ज्यादा कठिन हैं। अक्सर कविता लिखते या कहते वक्त कवि यह मंत्र ही भूल जाते हैं। निकष सर की कविताएं। इसलिए भी मेरे दिल के बेहद करीब हैं। क्योंकि वो बहुत सरल होती है। ना ही ये आपसे ज्यादा वक्त मांगती हैं। न ही बहुत अधिक आंखों को थकाती हैं। 61 पन्ने की इस किताब में हर एक पेज पर जैसे जिंदगी है। पहले दो सफे किताब की शीर्षक, प्रकाशन से जुड़ी जानकारी है। सर आप ऐसे ही लिखते रहें। नए काव्य संग्रह का बेसब्री से इंतजार है।इस कविता संग्रह से मेरी पसंद की एक और कविता की कुछ लाइनें
जब देखो तब खाली खाली
तनहा तनहा लगता है
तुमको खोकर भी खुश रहना
किसको अच्छा लगता है
