– श्री अग्रसेनधाम में निःशुल्क जीवन विद्या शिविर शुरू
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– अगले 13 अक्टूबर तक प्रतिदिन होंगे चार सत्र
रायपुर। अभ्युदय संस्थान अछोटी व्दारा आयोजित जीवन विद्या परिचय शिविर का शुभारंभ आज से श्री अग्रसेनधाम छोकरानाला रायपुर में हुआ। प्रबोधक श्री सोमदेव त्यागी ने कहा कि मानव ने जंगल युग से आज के स्वर्णिम युग तक बहुत तरक्की कर ली है, परन्तु अभी भी परिवार शिकायतमुक्त और अभावमुक्त नहीं हो पाए हैं। हमने अच्छे इंजीनियर और डाक्टर बना लिये हैं पर वे हर व्यक्ति के साथ अच्छा बर्ताव करें यह नहीं हो पाया। हम अच्छा मानव नहीं बन पाए हैं, जो पड़ोसी की साड़ी और गाड़ी से प्रभावित नहीं होता हो। हर मानव की मूल चाहत सुखी रहना है, परन्तु हम स्वयं को शरीर मानते हैं तो उसकी अनकूलता-प्रतिकूलता से प्रभावित हो जाते हैं और सुखी-दुखी होते हैं।
अग्रहार नागराज व्दारा प्रतिपादित अस्तित्वमूलक मानव केंद्रित चिंतन सह-अस्तित्ववाद मध्यस्थ दर्शन पर आधारित जीवन विद्या शिविर का आयोजन 13 अक्टूबर तक किया गया है। इसमें सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक चार सत्रों में प्रबोधन होता है। इसके शुभारंभ अवसर पर अग्रवाल सभा के अध्यक्ष श्री विजय अग्रवाल, महासचिव श्री मनमोहन अग्रवाल, डॉ. संकेत ठाकुर, उत्तम लता जैन, अरुण एवं सुचित्रा दीदी उपस्थित रहीं।
खालीपन बना हुआ है सोमदेव त्यागी ने कहा कि जंगल युग से आज के स्वर्णिम युग में मानव ने इतनी तरक्की कर ली है कि गरीबी से अमीरी की यात्रा पूरी की। अशिक्षा से शिक्षा की यात्रा पूरी की। पर मानव के भीतर खालीपन बना ही हुआ है। वह शरीर की आवश्यकताओं को पहचान गया है और उसे उपलब्ध कर पा रहा है। परन्तु मानव की मूल चाहता शारीरिक नहीं मानसिक है। वह निरंतर सुखी होना चाहता है। जब मेरे भाव और विचार में कमी या अभाव रहता है, तब-तब मैं दुःखी और अशांत रहता हूं। जब मैं समस्या के समाधान के साथ होता हूं, तब मैं सुखी होता हूं।
क्लास रूम में बना सकते हैं बेहतर इंसान उन्होंने कहा कि ढाई सौ साल पहले मानव ने भौतिक संसार को तर्कपूर्वक समझना प्रारंभ किया। जिस तरह भौतिक विज्ञान का अध्ययन कर हमने डाक्टर, इंजीनियर बन पा रहे हैं, उसी तरह चैतन्य संसार को भी क्लास रूम में पढ़ाकर बेहतर मानव बनाया जा सकता है। बेहतर मानव जो स्वयं में विश्वास के साथ परिवार में शिकायतमुक्त, अभावमुक्त रहता है। परिवार में हमारे संबंध बिना गिला, शिकवा, शिकायत के हो सकते हैं. सभी संबंध तृप्त हो सकते हैं। अभी हम शरीर की अनूकूलता और सुविधाओं को ही सुख मानते हैं, जबकि यह इंद्रिय सुख क्षणिक होता है। जबकि मैं यानी जीवन भाव और विचारों के साथ सुखी होता है। जैसे मुझे कार के बारे में पता है तभी मैं अच्छे से कार चला पाता हूं। उसी तरह मुझे जिंदगी के बारे में पता हो तभी मैं विश्वास के साथ जीवन चला पाऊंगा।
अमीर साधन सम्पन्न होकर भी दुखी श्री त्यागी ने कहा कि मनुष्य भाव और विचार से सुख या दुखी होता है। हर मानव सुख चाहता है, हर कोई बेहतर जीवन जीना चाहता है, परन्तु जीवन योग्यता और आत्मविश्वास से चलता है। उन्होंने कहा कि 50 साल पहले शादी परंपरागत तरीके से होती थी, आज वर-वधू में समान समझ देखी जाती है। पहले मानव को जीवनयापन करने के लिये बहुत अधिक श्रम करना पड़ता था लेकिन आज की पीढ़ी के सामने मानसिक श्रम अधिक है। उन्होंने कहा कि हर मानव के पास कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता है। चाहे अमीर हो या गरीब, सभी में सोचने की ताकत समान है, वह उस ताकत को जिस दिशा में लगाता है, उस दिशा में परिणाम आता है। उन्होंने कहा कि गरीब साधन विहीन होने के कारण दुखी दरिद्र रहता है। लेकिन अमीर साधन सम्पन्न होते हुए भी दुखी दरिद्र होते हैं, उनमें और कमाने की लालसा रहती है। इसलिये साधन के साथ उदार और सुखी होना चाहिये। यह हर मानव अपनी आवश्यकताओं का निर्धारण करके कर सकता है।
कोई नहीं चाहता गलती करना श्री त्यागी ने कहा कि कोई भी मानव गलती नहीं करना चाहता है क्योंकि जब वह गलती करता है तो असंतोष में रहता है। हर कोई सुखी रहना चाहता है, वह अपनी समझ के हिसाब से सुखी और सफल होने के ले काम करता है। पर सही की जानकारी नहीं होने के कारण गलती करता है। श्री त्यागी ने कहा कि हजारों साल पहले अध्यात्म और धर्म ने निष्कर्ष दिया कि इंद्रिय, धन और पद के सहारे जीकर सुखी नहीं रहा जा सकता है। आदमी भाव और विचारों से ही निरंतर सुख को प्राप्त कर सकता है। जिसकी अपने से बात हो गई, उसे अपनों से बात हो गई। जिसकी अपने से बात नहीं हुई, वह किसी के साथ संतुष्ट नहीं रह सकता है। हमारे धर्म और संस्कृति में आस्था से हमारी पीढ़ी बेहतर जीवन जी पाई, परन्तु आज की नई पीढ़ी में तर्क के साथ है। उसे समझदार बनाकर ही परिवार, समाज में तृप्ति के साथ जी सकते हैं।