रायपुर। मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस पर खैरागढ़ की मनोहर गौशाला एक प्रभावी उदाहरण बनकर सामने आई है। यहां जल संरक्षण, तालाब निर्माण और प्राकृतिक खेती के जरिए बंजर होती जमीन को फिर से उपजाऊ बनाया जा रहा है। पिछले 12 वर्षों में इस पहल से जल स्तर सुधरा है और किसानों को कम लागत में बेहतर उत्पादन मिल रहा है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिल रहा है। मनोहर गौशाला ने सूखा और भूमि क्षरण की समस्या से निपटने के लिए तालाब निर्माण और हरित क्षेत्र पर काम किया है। इससे बारिश का पानी संरक्षित हो रहा है और जमीन में नमी बनी रहती है। जैविक खाद और “फसल अमृत” जैसे उत्पाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ा रहे हैं। किसान अब रासायनिक खाद छोड़कर प्राकृतिक तरीके अपना रहे हैं, जिससे जमीन की सेहत सुधर रही है। यह पहल गांवों में टिकाऊ खेती का मजबूत उदाहरण बन रही है। क्यों जरूरी है यह मॉडल देश के कई हिस्सों में जमीन बंजर हो रही है और पानी की कमी बढ़ रही है। ऐसे में मनोहर गौशाला का मॉडल दिखाता है कि स्थानीय स्तर पर छोटे प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। जल संरक्षण और प्राकृतिक खेती से जमीन को फिर से उपजाऊ बनाया जा सकता है और सूखे के असर को कम किया जा सकता है।