- कविताओं की रिमझिम में भीगे श्रोता, कवि बसंत दीवान को दी काव्यांजली
रायपुर। कवि बसंत दीवान के जन्मदिन पर नगर के प्रबुद्ध लोगों ने उन्हें याद किया और कविताओं के जरिए उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनके पुत्र समीर दीवान द्वारा आयोजित कार्यक्रम कविताओं की रिमझिम में उन्हें जानने वालों ने उन्हें रौबीली आवाज वाले एक उदारमना व्यक्ति के रूप में याद किया जो लोगों की मदद के लिए हरदम तैयार रहता था और अन्याय के खिलाफ उठ खड़ा होता था। एक व्यक्ति, एक कवि, एक फोटोग्राफर, एक आंदोलनकारी के रूप में उनके संस्मरण साझा किए गए। कार्यक्रम में उनकी रिकार्डेड कविता भी सुनी गई और रायपुर के अलावा बिलासपुर से आए कवियों ने भी कवितापाठ किया।
गिरीश पंकज ने कहा कि उनका व्यक्तित्व और साहित्य दोनों दबंग थे। वे तालियां बटोरने के लिए चुटकुले सुनाने वाले कवि नहीं थे। उनकी कविताओं में संदेश होता था। उन्होंने कविता को मंच पर प्रतिष्ठित किया।
सतीश जायसवाल ने बताया- जब मैंने लिखना पढ़ना शुरू किया उस समय बसंत दीवान जी शीर्ष पर थे। जूनियर होने के कारण उनसे एक सम्मानजनक दूरी हमेशा बनी रही। उनके साहित्य पर तो चर्चा हो रही है। उनकी तस्वीरों पर भी चर्चा होनी चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार रुचिर गर्ग ने याद किया कि एक साथ काम करने के दौरान उनका व्यवहार दोस्ताना हुआ करता था। वे मित्र समीर के पिता थे लेकिन उन्होंने उम्र का फासला कभी महसूस नहीं होने दिया। एक जमाने में रोटी जैसे बुनियादी मुद्दों पर जो लोग एकजुट होकर बात करते थे, वे उनमें शामिल थे। उनका व्यक्तित्व बहुमुखी था। वे छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के प्रमुख एक्टिविस्ट थे।
कवियित्री नीलू मेघ ने बताया कि मुकीम भारती और बसंत दीवान जी ने ही उन्हें कवियित्री के रूप में मंच पर स्थापित किया। उनके साथ कई मंचों पर कवितापाठ करने का गौरवपूर्ण अवसर मिला।
कार्यक्रम में सुदीप ठाकुर, देवेंद्र गोस्वामी, संजय शाम, नंदकुमार कंसारी, अनु चक्रवर्ती, प्रज्ञा त्रिवेदी, रूपेंद्र राज, नीलिमा शर्मा, नीलू मेघ, वंदना केंगरानी, गिरीश पंकज, राजकुमार सोनी, मीर अली, आमना मीर जैसे बहुत से कवियोंं ने कविताएं पढ़ीं।
सुदीप ठाकुर की इन पंक्तियों को जोरदार समर्थन मिला-
इतनी साफ साफ शिनाख्त पहले कभी नहीं हुई
कहीं कुछ धुंधला रह ही जाता था
संकोच या लिहाज जैसा कुछ होता था
फिर वो आए और खींच दी बीचों बीच एक गहरी लकीर
यानी अब इस तरफ वे थे
और दूसरी तरफ जो वे नहीं थे
वे इतनी हड़बड़ी में थे कि हर फैसला
खुद ही कर डालना चाहते थे
फिर एक दिन घोषणा कर दी
कि जो हमारे साथ नहीं हैं, राजद्रोही हैं
शायर मीसम हैदरी ने ये पंक्तियां पढ़कर माहौल बना दिया
सच हमेशा आजमाया जाएगा
और कांटों पर चलाया जाएगा
तुमने आईना दिखाया था उन्हें
अब तुम्हें पत्थर दिखाया जाएगा।
बिलासपुर से आई अनु चक्रवर्ती ने पढ़ा-
लौटना होगा फिर से उसी मोड़ पर
जहां से साथ चलना शुरू किया था
इस लौटने में न जाने कितना कुछ
एक दूसरे के पास रह जाएगा
कवि पत्रकार पीसी रथ की डाक्टर बिटिया काव्या लंदन से घर आई हैं। उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी दोनों में कविताएं सुनाईं। उनकी कविता पाबंदियां लोगों के दिल तक पहुंची-
सुनसान रस्तों से दूर मैं भीड़ में चलती हूं
कंधों से कंधा मिलाने मैं धक्कों से गुजरती हूं
मेरी दुनिया में चौबीस घंटे नहीं होते
होते हैं तो बस वो दस घंटे
जो दिन के उजियारे ने मुझे दिए हैं
मेरा हर काम, हर शौक सीमित है सूरज ढलने तक
निकष परमार ने बसंत दीवान पर लिखी अपनी कविता सुनाई। एक दो और कविताओं के बाद यह मुक्तक पढ़ा-
जमीं पर गुजारे में मुश्किल बहुत है
उड़े जा रहे हैं हवा के सहारे
दवा की दुकानें बहुत हैं शहर में
मगर जिंदगी है दुआ के सहारे
देवेंद्र गोस्वामी ने ये पंक्तियां पढ़ीं-
कभी भी, कोई भी सवाल पूछ सकता था उससे पति
जवाब देना था उसे
चुप रहने पर शक होता
होता आया है ऐसा चुप रहने वालों के साथ
अग्निपरीक्षा तक देनी होती है चुप रहने वालों को
नंदा जाही का रे गीत से पहचान बनाने वाले कवि मीर अली ने ये पंक्तियां पढ़ीं-
बादलों की प्यालियों में
रोशनी परोसकर
चांद रात चांदनी
प्यास को भिगो रही
आमना मीर ने ये गजल पढ़ी-
बरसाते हैं अंगारे नफरत के हर रोज यहां
कुछ लोग हैं जिनको अमन पसंद नहीं आता
