कल एक अच्छे कार्यक्रम में जाना हुआ।
अच्छा कार्यक्रम इसलिए कि इसमें बहुत से ऐसे लोग आए थे जो अपने साथ साथ दुनिया के बारे में भी अच्छा सोचते हैं।
मौका था कवि बसंत दीवान के जन्मदिन पर आयोजित काव्य गोष्ठी का। कविताओं की रिमझिम नाम से उनके पुत्र समीर दीवान ने इसका आयोजन किया था।
समीर भैया बीच बीच में ऐसे आयोजन करते रहते हैं।
अपने पिता की रचनाओं का एक संकलन अनुगूंज के नाम से उन्होने प्रकाशित करवाया है। उसी से मुझे बसंत दीवान जी के साहित्य को जानने का मौका लगा। वरना बसंत चाचाजी को तो मैं बचपन से जानता था।
वे शब्दों से शौकिया खेलने वाले नहीं थे। वे पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के लिए जमीनी लड़ाई लड़ने वालों में से थे। उनकी रचनाएं दिल तक असर करती थीं। वे कवि के रूप में भी और एक व्यक्ति के रूप में भी अपने समय के जरूरतमंद, कमजोर, लाेगों के लिए एक संबल थे। क्योंकि उनके भीतर मानवता जिंदा थी। दूसरों की मदद करने की भावना थी। और अन्याय के प्रतिकार का साहस था।
बचपन में पापाजी के साथ रायपुर आया तो दीवानजी के स्टूडियो में भी जाना हुआ। वह प्रदेशभर के साहित्यकारों के लिए एक सराय हुआ करती थी। जो रायपुर आया, वहीं रुक गया। फिर अपनी सुविधा से अपना काम निबटा कर चला गया। ये सब मैंने बाद में बहुत से लोगों के संस्मरण सुनकर जाना।
एक बार आंख के इलाज के सिलसिले में मैं बूढ़ापारा में डा. जनस्वामी के अस्पताल में भर्ती था। पापाजी ने बसंत चाचाजी को खबर की होगी। वे अस्पताल में उनसे मिलने आए। उसी समय पुरानी बस्ती में रहने वाली बुआ मेरे लिए खाना लेकर आईं। चाचाजी ने कुछ देर तक यह नजारा देखा और कहा- कल से खाना हमारे घर से आएगा।
उनकी रौबीली आवाज से सहमी बुआ ने पापाजी की तरफ देखा। पापाजी ने कुछ कहा या नहीं मुझे याद नहीं। बस इतना याद है कि जब तक अस्पताल में रहा, भूल गया कि मैं अस्पताल में भर्ती हूं। बेहद स्वादभरा खाना चाचाजी के घर से आता था।
मैंने कभी एक शेर पढ़ा था-
सुना है संग दिल की आंख से आंसू नहीं बहते
अगर सच है तो दरिया क्यूं निकलता है पहाड़ों से
बस चाचाजी ऐसे ही थे। आवाज से सख्त। अंदर से दरियादिल।
कार्यक्रम की शुरुआत में उनकी कविता श्रृंगार किसे कहते है… उन्हीं की आवाज में सुनने को मिली। परिवार की नई पीढ़ी ने इस रिकार्डिंग को संजोकर रखा है, यह जानना सुखद था।
कार्यक्रम में उन्हें जानने वालों ने उनके बारे में बताया। गिरीश पंकज ने कहा कि उनका व्यक्तित्व और साहित्य दोनों की दबंग थे। वे तालियां बटोरने के लिए चुटकुले सुनाने वाले कवि नहीं थे। उनकी कविताओं में कोई न कोई सार्थक संदेश होता था। उन्होंने कविता को मंच पर प्रतिष्ठित किया।
सतीश जायसवाल ने बताया- जब मैंने लिखना पढ़ना शुरू किया उस समय बसंत दीवान जी शीर्ष पर थे। जूनियर होने के कारण उनसे एक सम्मानजनक दूरी हमेशा बनी रही। उनके साहित्य पर तो चर्चा हो रही है। उनकी तस्वीरों पर भी चर्चा होनी चाहिए। समीर भैया ने बताया कि इस दिशा में काम हो रहा है।
वरिष्ठ पत्रकार रुचिर गर्ग ने याद किया कि एक साथ काम करने के दौरान उनका व्यवहार दोस्ताना हुआ करता था। वे मित्र समीर के पिता थे लेकिन उन्होंने उम्र का फासला कभी महसूस नहीं होने दिया। एक जमाने में रोटी जैसे बुनियादी मुद्दों पर जो लोग एकजुट होकर बात करते थे, वे उनमें शामिल थे। उनका व्यक्तित्व बहुमुखी था। वे छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के प्रमुख एक्टिविस्ट थे।
कवियित्री नीलू मेघ ने बताया कि मुकीम भारती और बसंत दीवान जी ने ही उन्हें कवियित्री के रूप में मंच पर स्थापित किया। उनके साथ कई मंचों पर कवितापाठ करने का गौरवपूर्ण अवसर मिला।
कार्यक्रम में सुदीप ठाकुर, देवेंद्र गोस्वामी, संजय शाम, नंदकुमार कंसारी, प्रज्ञा त्रिवेदी, रूपेंद्र राज, नीलिमा शर्मा, नीलू मेघ, वंदना केंगरानी, गिरीश पंकज, राजकुमार सोनी, मीर अली, आमना मीर जैसे बहुत से कवियोंं ने कविताएं पढ़ीं। इनमें मैं भी शामिल रहा।
पीसी रथ भैया की डाक्टर बिटिया काव्या का अलग से जिक्र करना चाहूंगा। उसने बेहतरीन कविताएं पढ़ीं। उसे बहुत बहुत आशीर्वाद। समीर भैया को इसके लिए विशेष धन्यवाद।
बीच में तेज बारिश हुई और हॉल में अंधेरा छा गया। तुरंत मोबाइल के टार्च जले और दो इमरजेंसी लाइट का इंतजाम हुआ। नीम अंधेरे में कवितापाठ जारी रहा।
ड्यूटी का समय था इसलिए समापन से पहले ही लौट आना पड़ा।
समीर भैया को आयोजन के लिए बहुत बहुत बधाई। बहुत बहुत शुभकामनाएं।
(वरिष्ठ पत्रकार निकष परमार जी की फेसबुक वाल से)
