प्रेस क्लब में साथियों ने किया फोटोजर्नलिस्ट विनय शर्मा को याद
रायपुर। विश्व फोटोग्राफी दिवस पर प्रेस क्लब में होने वाली फोटो प्रदर्शनी इस बार सीनियर फोटो जर्नलिस्ट विनय शर्मा को समर्पित रहेगी। उनकी खींची तस्वीरों की किताब प्रकाशित करने में प्रेस क्लब हर संभव सहयोग करेगा। उनके अनुभवों को पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में शामिल करने के प्रयास किए जाएंगे। उनके नाम पर पुरस्कार देने की दिशा में भी विचार किया जाएगा। यह बात प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रफुल्ल ठाकुर व महासचिव वैभव बेमेतरिहा ने प्रेस क्लब में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में कही। इसमें आज पत्रकार साथियों व उन्हें जानने वालों ने उन्हें अपने संस्मरणों के साथ श्रद्धांजलि दी। इस मौके पर उनके पुत्र अमित भी उपस्थित थे।
सभी वक्ताओं ने उन्हें नाम के अनुरूप विनयशील बताया और कहा कि वे सबका खयाल रखते थे और चाहते थे कि उनके कारण किसी को कोई असुविधा न हो। काम के प्रति वे समर्पित थे और समय की कीमत समझते थे।
फोन करके देते थे अच्छा लिखने बोलने की बधाई
प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रफुल्ल ठाकुर ने उन्हें याद करते हुए बताया कि नई दुनिया में उनके साथ काम करने का अवसर मिला। वे हमें अपनी बाइक में िबठाकर ले जाते थे और जहां जाते थे वहां हमारा परिचय करवाते थे। उनके परिचय देने से होता यह था कि सामने वाला आश्वस्त हो जाता था कि विनय जी परिचय करवा रहे हैं तो बंदा ठीक ही होगा। इसे खबर बता देनी चाहिए। प्रफुल्ल ने याद किया कि नए लोगों के उत्साहवर्धन का कोई मौका विनय भैया छोड़ते नहीं थे। जब भी मैंने कुछ अच्छा लिखा या बोला वे कॉल करके तारीफ करते थे। वे घूमते फिरते बहुत थे और जहां जाते थे वहां से फोन भी लगा लेते थे। एक बार मुझे उन्होंने गौरेला पेंड्रा से याद किया था। आकाशवाणी के वरिष्ठ उद्घोषक कमल शर्मा उनके बड़े भाई थे। उन्हें एक बार अतिथि के तौर पर प्रेस क्लब में आमंत्रित किया गया था। इससे सबसे ज्यादा खुश विनय भैया थे।
पत्नी को आगे बढ़ाने में सहयोग किया
एक समय पत्रकारिता में रहे वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश पंकज ने बताया कि विनय जी से ज्यादा मेरा परिचय उनके बड़े भाई कमल शर्मा से था। मेरे लिए विनय को याद करना अपने छोटे भाई को याद करना है। रायपुर की पत्रकारिता में एक दौर विनय शर्मा और गोकुल सोनी के नाम था। वे एक सजग फोटोग्राफर थे। मेरा उनके पूरे परिवार से परिचय था। उनसे बहुत स्नेह मिला। जब मैं नवभारत का साहित्य पेज देखता था तब कई बार फूल पत्तियों या चिड़ियों की फोटो की जरूरत होती तो विनय जी से मांगता था। दूसरे प्रेस में होने के बावजूद वे फोटो देते थे। विनय जी ने अपनी साहित्यकार पत्नी का साथ दिया। उन्हें लेकर साहित्यिक कार्यक्रमों में जाते थे। उनके आने जाने पर कभी बंधन नहीं लगाया। रायपुर बिलासपुर भाटापारा सब जगह साहित्यिक कार्यक्रमों में उनके साथ रहे।
पेशे के प्रति ईमानदार थे
विनय शर्मा के सबसे अधिक समय तक साथ रहे फोटो जर्नलिस्ट गोकुल सोनी ने बताया कि छात्र जीवन में विनय एनसीसी की एयर विंग में थे। वे पायलट बनना चाहते थे। पर उनकी किस्मत में एक फोटोजर्नलिस्ट बनकर यश पाना लिखा था। एक समय वे रायपुर के भारती स्टूडियो में फोटोग्राफी सीख रहे थे। तब देशबंधु के सुनील कुमार को एक फोटोग्राफर की जरूरत थी। किसी ने उन्हें विनय शर्मा का नाम बताया। इस तरह वे प्रेस फोटोग्राफी से जुड़े। उनकी बाइक की हालत भले खराब हो पर वे उससे दूर दूर रिपोर्टिंग करने चले जाते थे। बाइक से उड़ीसा तक हो आए। वे काम के मामले में कोई बहाना नहीं बनाते थे। पेशे के प्रति ईमानदार थे। मित्र होने के बाद भी छिपाते थे कि फोटो खींचने कहां जा रहे हैं। अपने पेशे के लिए यह जरूरी भी था। गोकुल सोनी ने यह भी साझा किया कि एक अच्छी नौकरी इसलिए विनय शर्मा को नहीं मिल पाई क्योंकि उन्होंने किसी नेता से सिफारिश नहीं करवाई। यह नौकरी एक वरिष्ठ नेता की सिफारिश लेकर पहुंचे व्यक्ति को दे दी गई।
उन जैसों से समाज संपन्न होता है
वरिष्ठ पत्रकार समीर दीवान ने कहा कि नाम के अनुरूप वे विनम्र थे। स्नेही और संवेदनशील थे। उन जैसे लोगों के होने से समाज संपन्न होता है। और उनकी अनुपस्थिति से विपन्न। उनकी अनुपस्थिति मुझे अपनी विपन्नता का अहसास कराती रहेगी। दीवान ने याद किया कि अखबार में साथ काम करते समय विनय शर्मा फोटो बनाकर लाते थे और कहते थे कि इनमें से छांट लीजिए। हमें कहना पड़ता था कि छांटने की क्या जरूरत है। आप जो देंगे वह अच्छा ही होगा। लेकिन यह उनकी विनम्रता थी।
कुलपति की वो चर्चित तस्वीर
वरिष्ठ पत्रकार अनिरुद्ध दुबे ने उनके साथ काम करते हुए मिले अपने अनुभव साझा किए। एक बार रविशंकर विश्वविद्यालय में कुलपति को लेकर कुछ विवाद चल रहा था। विनय भैया ने सुबह सुबह कुलपति की साइकिल के साथ फोटो खींच ली। कुलपति ने आपत्ति की तो विनय भैया ने कहा कि यह उनका काम है। कुलपति ने कहा कि फिर मैं जो कहता हूं वह छपना चाहिए। फिर उंगली दिखाते हुए वे बोले- प्रशासन ने मुझे चैलेंज किया है और मैं उसका जवाब दूंगा। वह तस्वीर कुलपति के इसी बयान के साथ छपी और बहुत चर्चित हुई। इसी तरह एक वरिष्ठ नेता का एक बयान छपा कि कोई उनके पांव छुए यह उन्हें पसंद नहीं। और दूसरे ही दिन विनय भैया के कैमरे में एक आदमी उनके पैर छूते हुए कैद हो गया। यह तस्वीर भी छपी और चर्चित हुई।
छायाकार दीपक पांडे ने याद किया कि एक छात्र आंदोलन के कवरेज के दौरान वे स्कूल की बाउंड्री वाल कूद गए थे।
कविता संग्रह के प्रकाशन से बहुत खुश थे
सजला परमार ने याद किया कि जब वे विनय जी की पत्नी अपराजिता के साथ आकाशवाणी में काम करती थीं तब विनय भैया उन्हें लेने आते थे। वे इतने संकोची थे कि आंख उठाकर देखते तक नहीं थे। हमें लगता था कि वे बोलते भी हैं कि नहीं। फिर बहुत बाद में अस्पताल में उनसे मिलना हुआ। वहां वे अपने पुराने साथी निकष परमार को देखकर इतने उत्साहित हुए कि पुराने दिनों को याद कर लगातार बोलते रहे। उन्होंने इतनी बात की कि उन्हें बात न करने के लिए बोलना पड़ा। निकष परमार के काव्य संग्रह के विमोचन के अवसर पर वे बहुत अधिक खुश थे और कहा था कि निकष से अपनी फोटो की प्रदर्शनी लगाने के लिए कहें।
पत्रकारिता के विद्यार्थियों को पढ़ने चाहिए उनके अनुभव
विनय शर्मा के साथ काम कर चुके पत्रकार निकष परमार ने उनके साथ काम के अपने अनुभव बताए और कहा कि वे अपनी खींची तस्वीरों की एक किताब तैयार करना चाहते थे। इसकी सामग्री लगभग तैयार थी। उनके इस अधूरे सपने को पूरा किया जाना चाहिए। उनके अनुभवों को पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाना चाहिए। कम से कम पत्रकारिता के विद्यार्थियों को इसे पढ़ना चाहिए। विनय शर्मा के नाम से कोई फोटो स्पर्धा या सम्मान की शुरुआत की जानी चाहिए।
बचपन को बहुत याद करते थे
कार्यक्रम का संचालन कर रहे प्रेस क्लब महासचिव शिव वैभव पांडेय ने कहा कि प्रेस क्लब में होने वाली मुलाकातों में विनय भैया अक्सर अपने बचपन के दिनों को याद करते थे जो उड़ीसा के घने जंगलों के बीच बीता। उन्होंने कहा कि विनय भैया की विनयशीलता का एक अंश भी अगर हममें आ जाए तो वे आजीवन हमारे साथ रहेंगे। विनय शर्मा अपनी तस्वीरों और हमारी यादों में जीवित रहेंगे। कार्यक्रम में मिले सुझावों पर हम अमल करेंगे।
प्रेस क्लब से उन्हें ताकत मिलती थी
विनय शर्मा के पुत्र अमित ने कहा कि पिता के बारे में साथियों के वक्तव्य सुनने के बाद बहुत सी नई बातें पता चलीं। ये पता चला कि उनके जीवन में कितना संघर्ष था, उनके लिए समय का कितना महत्व था, वे काम के प्रति कितने समर्पित थे। बचपन में हम शिकायत करते थे कि वे हमें समय नहीं देते। उनके बारे में जानते गए तो यह शिकायत बेमानी होती गई। अमित ने कहा कि प्रेस क्लब उनके पिता का दूसरा परिवार था। उनका इस परिवार से बहुत जुड़ाव था। प्रेस क्लब में कोई कार्यक्रम हो, किसी का फोन आ जाए तो वे ऊर्जा से भर उठते थे। तुरंत गाड़ी उठाकर घर से निकल पड़ते थे।
